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anand, insidevivek, me, poem, vivek
खोलता हूँ जब वो पुरानी किताबें, मटमैले पन्नो में, सिमटी वो यादें , पृष्ट दर पृष्ट सरसराती उंगलियाँ मेरी, स्तब्ध हूँ, निशब्द हूँ मै, पर अनकहे शब्द कह जाती है खोलता हूँ जब वो पुरानी किताबें !
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02 Wednesday Nov 2011
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खोलता हूँ जब वो पुरानी किताबें, मटमैले पन्नो में, सिमटी वो यादें , पृष्ट दर पृष्ट सरसराती उंगलियाँ मेरी, स्तब्ध हूँ, निशब्द हूँ मै, पर अनकहे शब्द कह जाती है खोलता हूँ जब वो पुरानी किताबें !