मेहनत थी हमारी पर, अब वो मेहनताना मांगते हैं, सम्मान गया था मेरा
सरेआम अस्मत लुटी थी मेरी,
भूल हुई थी हमसे पर, अब वो हर्जाना मांगते हैं |
मांगते हैं |
26 Saturday Nov 2011
Posted in emotion, insidevivek
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तम्मना थी जो आपकी मेरे उगते हुए बालों को देखने की , काश ये समझ पाती कि मै तो उनकी परछाई को देखकर ही जीता हूँ |
कहते हैं वो मुझे जो खुली किताबें, शायद उन्हें पता नहीं वो अपनी उंगलियों की कशक छोड़ जाते हैं |
02 Wednesday Nov 2011
Tags
anand, insidevivek, me, poem, vivek
खोलता हूँ जब वो पुरानी किताबें, मटमैले पन्नो में, सिमटी वो यादें , पृष्ट दर पृष्ट सरसराती उंगलियाँ मेरी, स्तब्ध हूँ, निशब्द हूँ मै, पर अनकहे शब्द कह जाती है खोलता हूँ जब वो पुरानी किताबें !